Saturday, 4 October 2014

आप भी पा सकते हैं मनपसन्द संतान

chaitok


(प्रत्येक नव विवाहित दंम्पती के लिए एक आवश्यक लेख)

जीवन-मरण, आत्मा-परमात्मा आदि सब बहुत ही क्लिष्ट विषय हैं। इन विषयों के लिये कोई मापन पैमाना नहीं है, इसलिये यह गुह्य से और भी अधिक गुह्यतर हो गए हैं। परन्तु जीवन मरण की इस गुप्तादिगुप्त परमसत्ता को देखते हुए इसको चिरन्तर से स्वीकार किया जाता रहा है। इस सब के पीछे किसी परम सत्ता के अस्तित्व को प्रत्येक देश, समाज और धर्म में स्वीकार किया गया है।

भौतिक शरीर समाप्त होने के बाद जीवन के शरीर से जो सूक्ष्मतर पदार्थ अर्थात प्राण देह त्यागता है, उसको आत्मा कहा गया है। जीवन मरण की तरह आत्मा भी परम सत्य है। आत्मा अमर है, अविनाशी है। एक शरीर छोड़ने के बाद दूसरा भौतिक शरीर धारण करने तक सूक्ष्म वातावरण में आत्मा व्याकुल हो विचरता रहता है। अपने-अपने कर्म भोग सिद्धान्त के अनुरुप अच्छी और बुरी आत्माएँ उपयुक्त और अनुकूल वातावरण पाने और तदनुसार भावी माता-पिता के विषय में चिन्तित रहती हैं। 

सामान्य आत्माओं को तो अधिकांशतः अपने अनुरुप माता-पिता मिल जाते हैं परन्तु अत्यन्त श्रेष्ठतम अथवा अति निऔष्ट आत्माऐं अनुकूल वातावरण जल्दी नहीं तलाश पातीं। इसका मूल कारण यह है कि दोनों प्रकार की आत्माओं में सकारात्मक अथवा नाकारात्मक ऊर्जाओं का भरपूर भण्डार भरा होता है और इसी कारण से वह प्रतिकूल स्थान, वातावरण, माता-पिता आदि से सामजस्य नहीं बना पातीं। सौभाग्य से यदि ऐसी आत्माओं को उचित कोख मिल भी जाती है तो उनका अस्तित्व दीर्घकालीन नहीं हो पाता। 

वह शीघ्र ही पुनः शरीर छोड़ देती हैं और अनुकूल-अनुरुप जीव शरीर के लिए सूक्ष्म जगत में व्याकुल होने लगती हैं, सामान्यतः यही देखने को मिला है। संसार में प्रत्येक वस्तु साकार से निराकार और निराकार से साकार तथा स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से स्थूल रुप परिवर्तित करती रहती है। सूक्ष्म निराकार आत्मा पुनः स्थूल साकार जीव बन जाते हैं, यही विधि का नियम है।

इतिहास अथवा विषयक सनातनी वांगमय को तलाशें तो यही पाएंगे कि अति विशिष्ट और अति निऔष्ट जीव आत्माओं का अस्तित्त्व न्यून ही रहा है। किसी भी युग के अधिकांशतः उदाहरणों में यह प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। आप स्वयं मनन करें, श्रेष्ठ आत्मनों का जन्म भी वहाँ ही हुआ है जहाँ उनको अनूकूल सकारात्मक वातावरण और माता-पिता मिले हैं और यही परम सत्य है। राम, औष्ण,गौतम, मीरा, मीर, नजीर, कबीर, रसखान, ईसा, मौहम्मद, नानक, चैतन्य, वाल्मीकि, रामऔष्ण, स्वामी विवेकानन्द, श्री राम, साई बाबा, गजानन महाराज और दूसरी ओर रावण, कंस, दुर्योधन आदि अनेकों उदहारणों से इस परम सत्य सत्ता की पुष्टि स्वतः ही हो जाती है।

शास्त्रों में लिखा है कि स्त्री और पुरुष का सामाजिक रुप से स्थाई मिलन अर्थात विवाह स्वस्थ, संस्कारवान, गुणवान, प्रतिभावान, कुलीन और प्रत्येक दृष्टिकोण से सुयोग्य संतान की प्राप्ति के उदेश्य से  भी निर्धारित किया जाता है। परन्तु जब तक नवदम्पत्ति भावावेश, कामोवेश आदि मोह के कारण जीव के अति गुह्यतर और गुप्तादिगुप्त तथ्य को समझने की स्थिति में पहुँचते हैं तब तक बहुत ही देर हो चुकी होती है। 

यौवन, शारीरिक मोह, काम, भोग-वासना, भौतिकवादी विलासी जीवन आदि के मोहपाश में लिप्त नव दम्पत्ति को तो ज्ञान दिया जाता है और हि उनके पास समय अथवा धैर्य होता हे प्राऔतिक नियमों के पालन करने का। परिणाम स्वरुप हो रहे जनसंख्या के विस्फोट स्वरुप दुष्परिणाम हमारे सामने प्रत्यक्ष हो ही रहे हैं और यह अल्प संख्या में नहीं है वरन व्यापक स्तर पर देखने को मिल रहे हैं।

मनुष्य जीवन सहज में ही नहीं मिलता। संतान सुख के इच्छुक दम्पत्तियों को इसके लिए पूर्व में ही आवश्यक तैयारियाँ कर लेना चाहिए सर्वप्रथम अपने शरीर तथा मन को इस योग्य बनाएं कि जीवात्मा को स्वस्थ अनुकूल वातावरण तैयार मिले। कहावत भी है कि अस्वस्थ शरीर में पलने वाले जीव के जीवन से जुड़ी तमाम आवश्यक कड़ियाँ भी अस्त-व्यस्त हो जाती हैं। इसलिए अपने खान-पान, आचार, व्यवहार, योग और सात्विक मानसिकता से नयी आत्मा के लालन पालन के लिए अनुकूल स्वस्थ वातावरण तैयार रखें।

श्रेष्ठ सन्तान के लिए गर्माधान संस्कार में दूसरी महत्त्वपूर्ण सावधानी है विशुद्ध मुहूर्त गणना। यह अति क्लिष्ट विषय है और योग्य विद्धान द्वारा ही खगोल, ज्योतिष, अंक शास्त्र आदि गुह्य विधाओं के द्वारा ही गणना किया जा सकता है। बहुत ही सामान्य से नियमों के अनुसार गर्माधान संस्कार के लिए षष्ठी, अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा तिथियाँ निन्दित मानी गयी हैं अर्थात विष्टिकरण, रविवार, मंगलवार, शनिवार, माता-पिता के श्राद्ध का दिन, संध्या काल, रिक्ता तिथि अर्थात चतुर्थी, नवमी तथा चतुर्दशी श्रेष्ठ नहीं होती हैं। मृगशिरा, हस्त, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, घनिष्ठा, शतभिषा और ध्रुव संज्ञक नक्षत्र अर्थात तीनों उत्तरा, रोहिणी आदि नक्षत्र गर्भाधान हेतु शुभ माने गए हैं। 

साथ ही स्त्री-पुरुष की जन्मकालीन ग्रह तथा वर्तमान ग्रह गोचर की स्थिति का विचार भी परम आवश्य है। यदि स्त्री की जन्म राशि से उपचय स्थान अर्थात तीसरे छठे, दूसरे और ग्यारहवें में से किसी भी स्थान पर चन्द्रमा, मंगल द्वारा देखा जा रहा हो या पुरुष की जन्म राशि से उपचय स्थान में चन्द्रमा गुरु के द्वारा दृष्टि स्म्बन्ध रखता हो तब ही इन शुम मुर्हूतों में गर्भाधान सम्भव होगा तथा कुल की मर्यादा बढ़ाने वाली श्रेष्ठ संतान उपन्न होगी।

गर्भाधान के बाद स्त्री की जन्म एवं गोचर ग्रह स्थिति ही वस्तुतः गर्म रक्षा के लिए सहायक सिद्ध होती है, इसलिए मुहूर्त के साथ-साथ इस गम्भीर विषय पर भी सिद्धहस्त ज्योतिष गणनाओं द्वारा पूर्व में अवलोकन करवा लेना ही बौद्धिकता है।

स्वस्थ शरीर और दिव्य आत्माओं के आवाहन मुहूर्त के साथ-साथ तीसरी आवश्यक तैयारी है स्वर योग साधन। स्वर योग मनोवैज्ञानिक, खगोल विज्ञान और सम्पूर्ण शरीर शास्त्र का एक सुन्दर समन्वय है। स्वर शास्त्र के अनुसार श्वास-निश्वास के मार्गों को नाड़ी कहते हैं। इड़ा, पिंगला, सुषम्ना, गांधारी आदि दस प्रमुख नाड़ियों सहित शरीर में कुल 7200 नाड़ियाँ है। किस नाड़ी में कौन सी भौतिक और आघ्यात्मिक उपलब्धियाँ सिद्ध की जा सकती हैं, इसका विवरण शिव स्वरोदय नामक ग्रंथ में विस्तृत रुप से मिलता है।

यह पिण्ड अर्थात शरीर अखिल विश्व ब्रह्माण का ही एक सूक्ष्म शरीर है। प्रऔति के नियमों में समस्त ब्रह्माण्ड की व्यवस्था चल रही है। शरीर में इड़ा, पिंगला और सुशुम्ना नाड़ी श्वास की मुख्य गतियाँ हैं। कौन से स्वर में स्त्री-पुरुष दिव्य आत्माओं के आवाहन के लिए काम-क्रीड़ा करें कि कुलीन संतान का जन्म हो, यह स्वर शास्त्रों में स्पष्ट रुप से लिख दिया गया है। सबसे मुख्य बात यह कि अनेकानेक भौतिक उपलब्धियों के साथ-साथ स्वर ज्ञान आत्मा को अन्ततः परमात्मा से जोड़ देता है।


परन्तु सबसे बड़ा दुभार्ग्य यह है कि इस परम ज्ञान, मुहूर्त आदि विषय सामग्री को आज अंधविश्वास बना दिया गया है और जब तक हम इस दिव्य गुह्य ज्ञान को समझने-परखने की स्थिति में पहुँचते हैं तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है।

Source=amarujala.com

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