Saturday, 4 October 2014

रोग और मृत्यु के मुंह से बचा लेता है महामृत्युंजय मंत्र

इस मंत्र से यमराज भी घबराते हैं

भगवान शिव को कालों का काल महाकाल कहा जाता है। मृत्यु अगर निकट जाए और आप महाकाल के महामृत्युंजय मंत्र का जप करने लगे तो यमराज की भी हिम्मत नहीं होती है कि वह भगवान शिव के भक्त को अपने साथ ले जाए।

इस मंत्र की शक्ति से जुड़ी कई कथाएं शास्त्रों और पुराणों में मिलती है जिनमें बताया गया है कि इस मंत्र के जप से गंभीर रुप से बीमार व्यक्ति स्वस्थ हो गए और मृत्यु के मुंह में पहुंच चुके व्यक्ति भी दीर्घायु का आशीर्वाद पा गए।

यही कारण है कि ज्योतिषी और पंडित बीमार व्यक्तियों को और ग्रह दोषों से पीड़ित व्यक्तियों को महामृत्युंजय मंत्र जप करवाने की सलाह देते हैं। अब अगर आपके मन में यह सवाल रहा है कि यह मंत्र किस तरह काम करता है तो इसका वैज्ञानिक पहलू भी सामने आया है, इसे भी जान लीजिए।


मंत्र रोगों से मुक्त करा सकता है

विज्ञान की मानें तो ध्वनि और कुछ नहीं विद्युत् का एक रूपान्तरण मात्र है। योगीजन कहते हैं कि विद्युत् ध्वनि अर्थात शब्द स्फोट का रूपांतरण है। अब यह तथ्य सामने आ रहा है कि दोनों का परस्पर रूपांतरण हो सकता है। सेंटर फॉर स्पिरिचुअल एड योगा, चेन्नई के योगी पीआर सहस्रबुद्धे ने अपने शोधकेंद्र में कुछ प्रयोग किए और पाया कि मंत्रों के जप से वाकई फायदा होता है।

एक प्रयोग महामृत्युंजय मंत्र को ले कर था। इस बारे में लोगों की उम्मीद रहती है कि मंत्र असाध्य रोगों को ठीक कर देता है। पर योगी सहस्रबुद्धे का मानना है और अनुभव भी कि मंत्र रोगों से मुक्त करा सकता है, पर हमेशा नहीं। वह तभी सहायक होता है, जब उसकी शक्ति को जगाया जाए। प्रयोग के दौरान कुछ बाधाएं आती हैं। इन बाधाओं की वजह पारंपरिक भाषा में आसुरी शक्तियां बताई जाती हैं, जबकि सहस्रबुद्धे के अनुसार मंत्र साधना से अपने चित्त में छाए संस्कार घुलने साफ होने लगते हैं।

ये संस्कार चित्त और चेतना में कुछ इस तरह घुले होते हैं, जैसे किसी कमरे में महीनों से गंदगी फैली हो और सफाई के दौरान वह एक साथ बाहर होने लगे तो आसपास कुछ देर के लिए स्थितियां अस्त व्यस्त होने लगे। योगशास्त्र के जानकारों के अनुसार शरीर की आंतरिक रचना मे चौरासी ऐसे केंद्र हैं, जहां प्राण ऊर्जा सघन और विरल रूप में मौजूद रहती है।





 जीवनी शक्ति शरीर छोड़ कर चली जाती है

इन केद्रों को योग की भाषा में उपत्यका कहते हैं। रोग और विक्षोभ इन्ही उपत्यतकाओं से पैदा होते हैं। जप के दौरान महामृत्युजंय मंत्र की ध्वनि इन केंद्रों को सक्रिय करती है। सहस्रबुद्धे के प्रयोगों की भाषा में कहें तो उन केंद्रों पर पहुंच कर ध्वनि विद्युत तरंगों को विचलित करती हैं।

रोग का उपचार या मल विकारों का शोधन उन तंरगों से ही होता है। सत्तर प्रतिशत संभावना तो यह रहती है कि रोग ठीक हो जाए। तीस प्रतिशत मामलों में रोग का उभार बढ़ जाता है और रोगी का जीवन खतरे में पड़ जाता है। अर्थात रोग या तो ठीक हो जाता है या रोगी की चेतना शरीर छोड़ जाती है।

पंरपरागत भाषा में महामृत्युंजय मंत्र का प्रभाव रोगी को मृत्यु के भय से मुक्त कर देता है। रोग ठीक हो जाए तो भी मृत्यु का भय मिट जाता है और ठीक नहीं हो तो रोगी की जीवनी शक्ति शरीर छोड़ कर चली जाती है। इस तरह भी रोगी मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। मंत्रयोगी पं.श्यामसुंदर दास के अनुसार परिणाम जो भी हो. महामृत्युंजय मंत्र जीवन चेतना को प्रखर करता है।

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